बहुत-से लोग सोचते हैं कि कर साल के अंत में, रिटर्न भरते समय ही देना होता है। पर अगर आपकी कुल कर देनदारी एक तय सीमा से ऊपर है, तो नियम के अनुसार कर को साल भर में किश्तों में चुकाना होता है — इसे एडवांस टैक्स कहते हैं।

यह ख़ासकर उन लोगों के लिए मायने रखता है जिनकी आय पर पहले से पूरा कर नहीं कटता।

किसे देना पड़ता है

यह आमतौर पर उन लोगों पर लागू होता है जिनकी कर देनदारी एक सीमा से अधिक है और जिनकी आय पर स्रोत पर पूरा कर (TDS) नहीं कटता — जैसे फ्रीलांसर, व्यवसायी, या जिनकी बड़ी आय ब्याज/पूँजीगत लाभ से हो। सिर्फ़ वेतन पाने वालों का कर अक्सर पहले ही कट जाता है, पर अतिरिक्त आय होने पर उन पर भी लागू हो सकता है।

अपनी स्थिति समझना ज़रूरी है।

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समय पर देना ज़रूरी क्यों

एडवांस टैक्स की किश्तें तय समय पर चुकानी होती हैं; देर या चूक होने पर अतिरिक्त ब्याज/शुल्क लग सकता है। इसलिए अपनी अनुमानित आय और कर का हिसाब पहले से रखना और समय पर भुगतान करना समझदारी है।

रिकॉर्ड रखना गणना और रिटर्न, दोनों को आसान बनाता है।

संदेह हो तो सलाह लें

एडवांस टैक्स के नियम, सीमाएँ और तारीख़ें बदल सकती हैं, और हर की स्थिति अलग होती है। इसलिए अगर आप पर यह लागू होता है, तो नवीनतम नियम जाँचें और ज़रूरत हो तो कर-विशेषज्ञ से सलाह लें।

यह लेख सामान्य शैक्षिक जानकारी है, कर सलाह नहीं।

यह किन पर लागू होता है

अग्रिम कर का सामान्य सिद्धांत यह है कि कर उसी वर्ष चुकाया जाए जिस वर्ष आय हुई, न कि वर्ष बीत जाने के बाद एक साथ। इसे "जैसे कमाओ, वैसे चुकाओ" कहा जाता है।

वेतनभोगी व्यक्ति के लिए यह काम आमतौर पर अपने-आप हो जाता है, क्योंकि नियोक्ता हर महीने वेतन से कर काटता है। इसलिए बहुत से लोगों को कभी अग्रिम कर की चिंता नहीं करनी पड़ती।

पर वही वेतनभोगी व्यक्ति जब वेतन के अलावा कोई और आय कमाता है — ब्याज, किराया, लाभांश, प्रतिभूतियों की बिक्री, या कोई अतिरिक्त काम — तो उस आय पर कर अपने-आप नहीं कटता।

यहीं अधिकांश लोग चूक जाते हैं। उन्हें लगता है कि नियोक्ता ने कर काट दिया इसलिए मामला पूरा है, जबकि अन्य आय पर देय कर उनकी अपनी ज़िम्मेदारी बना रहता है।

स्वरोज़गार करने वालों, पेशेवरों, दुकानदारों और स्वतंत्र रूप से काम करने वालों के लिए तो यह पूरी व्यवस्था ही अग्रिम कर पर चलती है, क्योंकि वहाँ कोई नियोक्ता काटने वाला नहीं है।

नियमों में कुछ श्रेणियों के लिए छूट भी है — जैसे कुछ शर्तों के साथ वरिष्ठ नागरिक। अपनी स्थिति पर क्या लागू होता है, यह एक बार किसी योग्य कर सलाहकार से जाँच लेना उचित है।

चार तारीख़ों वाला ढाँचा

अग्रिम कर एक साथ नहीं, वर्ष भर में कुछ किस्तों में चुकाया जाता है। हर किस्त पर अनुमानित वार्षिक कर का एक निर्धारित प्रतिशत तक जमा हो जाना चाहिए।

यह ढाँचा संचयी है, यानी हर किस्त पर यह देखा जाता है कि उस तारीख़ तक कुल कितना जमा हुआ, न कि उस किस्त में अकेले कितना दिया।

इसका एक व्यावहारिक लाभ है: अगर किसी किस्त में कम जमा हुआ, तो अगली किस्त में अतिरिक्त डालकर उसे काफ़ी हद तक ठीक किया जा सकता है, हालाँकि बीच की अवधि का ब्याज लग जाता है।

गणना का आधार अनुमान है, और अनुमान ग़लत होना सामान्य है। इसलिए हर किस्त पर पूरे वर्ष का अनुमान दोबारा बनाना चाहिए, न कि साल की शुरुआत वाला अनुमान दोहराते रहना चाहिए।

अंतिम किस्त के बाद भी, वर्ष समाप्त होने से पहले एक बार पूरा हिसाब देख लेना उपयोगी है। साल के आख़िरी हफ़्तों में हुई कोई बड़ी आय पूरे अनुमान को बदल देती है।

भुगतान ऑनलाइन किया जा सकता है और उसकी रसीद तुरंत मिल जाती है। उस रसीद को सँभालकर रखिए और यह जाँचिए कि वह राशि आपके फ़ॉर्म 26AS में दिख रही है।

चूकने पर क्या होता है

अग्रिम कर न चुकाने या कम चुकाने पर जुर्माना नहीं, ब्याज लगता है। यह अंतर महत्वपूर्ण है, क्योंकि ब्याज एक गणना है, दंड नहीं, और वह समय के साथ बढ़ता है।

ब्याज दो तरह से लग सकता है: एक, किस्तों में कम जमा करने पर; और दूसरा, वर्ष समाप्त होने के बाद बचे हुए कर पर, भुगतान की तारीख़ तक।

यही कारण है कि देर से चुकाने पर भी जल्दी चुकाना बेहतर है। ब्याज महीनों के हिसाब से गिना जाता है, इसलिए हर बीता महीना उसे बढ़ाता है।

यहाँ एक आम स्थिति है: कोई बड़ी बिक्री या एकमुश्त आय साल के बीच में आ जाती है, और व्यक्ति यह मानकर चलता है कि रिटर्न भरते समय कर चुका देगा। तब तक कई महीनों का ब्याज जुड़ चुका होता है।

दूसरी आम स्थिति: वेतन से कर तो कट रहा है, पर बचत खाते और जमा के ब्याज पर नहीं। साल के अंत में वह छोटी-छोटी राशि मिलकर एक ऐसा अंतर बना देती है जिस पर ब्याज लगता है।

इससे बचने का सबसे सरल तरीक़ा यह है कि नियोक्ता को अन्य आय की घोषणा कर दी जाए, जहाँ यह संभव हो। तब कर वेतन से ही कट जाता है और अलग से कुछ करना नहीं पड़ता।

अनुमान लगाने का व्यावहारिक तरीक़ा

अनुमान लगाना कठिन लगता है और असल में एक पन्ने का काम है, ख़ासकर अगर उसे हर तिमाही दोहराया जाए।

ऊपर सारी अपेक्षित आय की सूची बनाइए: वेतन, ब्याज, किराया, लाभांश, कोई पेशेवर आय, और परिसंपत्तियों की बिक्री से होने वाला लाभ।

फिर लागू कटौतियाँ घटाइए — वही जो आप वास्तव में लेने वाले हैं, वे नहीं जो लेने का इरादा है। इरादे पर बनाया गया अनुमान लगभग हमेशा कम कर दिखाता है।

बची हुई राशि पर अपनी व्यवस्था के अनुसार कर निकालिए, फिर उसमें से वह कर घटाइए जो पहले ही स्रोत पर कट चुका है या कटने वाला है। जो बचता है, वही अग्रिम कर के रूप में देना है।

इस पन्ने को हर तिमाही दोबारा भरिए, पुराना मिटाकर नहीं बल्कि उसके नीचे। तीन-चार बार करने के बाद यह पाँच मिनट का काम रह जाता है, और अनुमान काफ़ी सटीक होने लगते हैं।

जिनकी आय जटिल है — व्यवसाय, कई स्रोत, बड़ी पूँजीगत बिक्री — उनके लिए यह हिसाब एक बार किसी योग्य कर सलाहकार के साथ बैठकर बनाना बेहतर है, और उसके बाद वही ढाँचा दोहराया जा सकता है।

एक साल का सरल कैलेंडर

अग्रिम कर को याद रखने का सबसे अच्छा तरीक़ा उसे कैलेंडर में डाल देना है, ताकि वह हर बार एक नई खोज न बने।

हर किस्त की तारीख़ से एक हफ़्ता पहले का अनुस्मारक लगाइए, तारीख़ का नहीं। एक हफ़्ता इसलिए, क्योंकि अनुमान बनाने और भुगतान करने में समय लगता है।

उसी दिन तीन काम कीजिए: अनुमान दोबारा बनाइए, आवश्यक राशि जमा कीजिए, और रसीद उसी वित्तीय वर्ष के फ़ोल्डर में रख दीजिए।

साल में एक बार, आमतौर पर रिटर्न भरने के समय, यह भी मिला लीजिए कि जो अग्रिम कर आपने जमा किया वह फ़ॉर्म 26AS में सही दिख रहा है। कभी-कभी भुगतान ग़लत मूल्यांकन वर्ष में दर्ज हो जाता है।

अगर ऐसा हुआ हो, तो उसे सुधारा जा सकता है, पर उसके लिए भुगतान की रसीद चाहिए — यही वह जगह है जहाँ फ़ोल्डर वाली आदत काम आती है।

और अंत में एक बात जो पूरे विषय पर लागू होती है: नियम, दरें और सीमाएँ समय-समय पर बदलती हैं। हर साल की शुरुआत में यह देख लेना कि इस वर्ष क्या लागू है, पिछले वर्ष का ढाँचा दोहराने से कहीं बेहतर है।