बीमा भारत में अक्सर उलटे तरीक़े से बिकता है: सुरक्षा की बात से नहीं, "मैच्योरिटी पर इतना वापस मिलेगा" की चमक से। नतीजा एक जाना-पहचाना घर-घर का दृश्य है — मोटे प्रीमियम वाली कई पॉलिसियाँ, और फिर भी परिवार की असली सुरक्षा इतनी छोटी कि एक बड़ी अनहोनी में कुछ ही साल चल पाए। इस लेख का काम किसी कंपनी की तारीफ़ या बुराई नहीं — सिर्फ़ दो अलग सवालों को अलग करना है, जिन्हें बाज़ार जान-बूझकर मिला देता है।

सवाल पहला: मेरे न रहने पर परिवार का क्या होगा? यह सुरक्षा का सवाल है। सवाल दूसरा: मेरा पैसा कैसे बढ़े? यह निवेश का सवाल है। दोनों के सबसे अच्छे जवाब अलग-अलग औज़ारों में मिलते हैं।

टर्म का गणित: छोटा प्रीमियम, बड़ा कवच

टर्म इंश्योरेंस बीमे का सबसे शुद्ध रूप है: तय अवधि तक हर साल छोटा प्रीमियम; अवधि में अनहोनी हो तो परिवार को पूरी बीमित रक़म; अवधि बीत जाए तो कुछ वापस नहीं। "कुछ वापस नहीं" सुनकर ही ज़्यादातर लोग ठिठकते हैं — पर यही उसकी ताक़त है। चूँकि कंपनी को हर हाल में कुछ लौटाने का वादा नहीं निभाना, वही प्रीमियम कई गुना बड़ी सुरक्षा ख़रीद लेता है। मोटा नियम कहता है कि परिवार की सुरक्षा सालाना आमदनी के दस से पंद्रह गुना और बक़ाया कर्ज़ों के बराबर होनी चाहिए — यह आँकड़ा आम घरों की पहुँच में सिर्फ़ टर्म से आता है।

तुलना में "पैसा-वापस" और एंडाउमेंट क़िस्म की पॉलिसियाँ एक ही प्रीमियम से दो काम कराने की कोशिश हैं — थोड़ा बीमा, थोड़ी बचत। नतीजा प्रायः दोनों तरफ़ समझौता: सुरक्षा ज़रूरत से बहुत छोटी, और बचत वाला हिस्सा ऐसे रिटर्न पर जो महँगाई से बमुश्किल आगे निकलता है। लंबी अवधि के आँकड़ों में "सस्ता टर्म + बाक़ी रक़म का अलग, पारदर्शी निवेश" वाला रास्ता ज़्यादातर परिवारों के लिए दोनों सवालों के बेहतर जवाब देता आया है।

"प्रीमियम डूब गया" की भावna का जवाब

टर्म के ख़िलाफ़ सबसे बड़ा तर्क भावनात्मक है: "बीस साल भरता रहा और कुछ मिला नहीं।" इसका ईमानदार जवाब है — मिला, और सबसे क़ीमती चीज़ मिली: वे बीस साल, जिनमें आपके परिवार के सिर पर छत की गारंटी थी। हम गाड़ी के बीमे से साल के अंत में "पैसा वापस" नहीं माँगते, और दुआ करते हैं कि दावा कभी करना ही न पड़े। जीवन के बीमे को भी उसी नज़र से देखना, पैसे की समझ की एक बुनियादी सीढ़ी है।

व्यावहारिक क़दम सीधे हैं: कमाने वाले हर सदस्य के लिए आमदनी के दस-पंद्रह गुना का टर्म कवर; प्रस्ताव-फ़ॉर्म में सेहत और आदतों का सौ फ़ीसदी सच (दावे के समय यही सच परिवार की ढाल बनता है); नॉमिनी अपडेट; और पॉलिसी की जानकारी परिवार को। बाक़ी जो प्रीमियम "बचा", वह अपने नाम के निवेश-सवाल के हवाले कीजिए — PPF से इंडेक्स फंड तक, जहाँ आपकी योजना कहे। बीमा परिवार के लिए है, निवेश भविष्य के लिए — दोनों को अलग रखिए, दोनों बेहतर काम करेंगे।