लोन लेते समय ज़्यादातर लोग सिर्फ़ एक चीज़ देखते हैं — “EMI कितनी है?” छोटी EMI राहत जैसी लगती है, पर यह पूरी तस्वीर नहीं है। EMI के पीछे ब्याज दर, अवधि और आपके द्वारा चुकाई जाने वाली कुल रक़म की कहानी छिपी होती है।

कर्ज़ लेने से पहले असली लागत समझना ज़रूरी है।

लंबी अवधि का धोखा

अवधि लंबी करने पर EMI घट जाती है, जिससे लोन “सस्ता” लगता है। पर लंबी अवधि का मतलब है ज़्यादा महीनों तक ब्याज देना, यानी कुल मिलाकर कहीं अधिक रक़म चुकाना। छोटी EMI अक्सर बड़ी कुल लागत छिपाती है।

इसलिए सिर्फ़ EMI नहीं, कुल चुकाई जाने वाली रक़म देखें।

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देखने लायक़ बातें

ब्याज दर (और वह घटती-बढ़ती है या तय), प्रोसेसिंग फ़ीस और अन्य शुल्क, समय से पहले चुकाने (प्रीपेमेंट) के नियम, और कुल चुकाई जाने वाली रक़म — इन सबको देखें। और सबसे ज़रूरी: क्या EMI आपके बजट में आराम से आती है, तब भी जब कोई अनपेक्षित ख़र्च आए।

ऊँची ब्याज दर वाले कर्ज़ से ख़ास सावधान रहें।

कर्ज़ सोच-समझकर

कर्ज़ एक उपयोगी औज़ार हो सकता है जब वह किफ़ायती हो, किसी टिकाऊ चीज़ के लिए हो, और उसकी किश्तें आराम से चुकाई जा सकें। इन कसौटियों पर परखें, फिर निर्णय लें।

यह लेख सामान्य जानकारी है, कोई ऋण सलाह नहीं।

ईएमआई के अंदर क्या-क्या है

हर किश्त दो हिस्सों से बनी होती है: ब्याज और मूलधन। किश्त की राशि पूरी अवधि में एक जैसी रहती है, पर इन दोनों का अनुपात हर महीने बदलता रहता है।

शुरुआती महीनों में ब्याज का हिस्सा सबसे बड़ा होता है, क्योंकि शेष मूलधन सबसे ज़्यादा होता है। अंतिम महीनों में लगभग पूरी किश्त मूलधन में जाती है।

इसका एक महत्वपूर्ण नतीजा है: ऋण के पहले तिहाई हिस्से में जितनी किश्तें चुकाई गईं, उनसे शेष मूलधन उतना नहीं घटा जितना लोग मान लेते हैं।

यही कारण है कि दो साल किश्त चुकाने के बाद जब कोई अपना बकाया देखता है, तो वह संख्या अक्सर अपेक्षा से बड़ी निकलती है, और यह अनुभव निराश करता है।

हर बैंक परिशोधन तालिका देता है, जिसमें हर महीने का ब्याज और मूलधन अलग-अलग लिखा होता है। ऋण लेते समय यह तालिका माँगिए और एक बार पूरी देख लीजिए।

वह एक पन्ना ऋण के बारे में उतना बता देता है जितना बाक़ी सारे दस्तावेज़ मिलकर नहीं बताते, और उसे पढ़ने में पाँच मिनट लगते हैं।

फ़्लैट दर और घटती शेष दर

यह वह जगह है जहाँ सबसे ज़्यादा भ्रम पैदा होता है, और यह भ्रम हमेशा उधार लेने वाले के ख़िलाफ़ जाता है।

घटती शेष दर में ब्याज उस राशि पर लगता है जो अभी बाक़ी है। जैसे-जैसे मूलधन घटता है, ब्याज भी घटता है। यह वह तरीक़ा है जिसे अधिकांश लोग स्वाभाविक मानते हैं।

फ़्लैट दर में ब्याज पूरी मूल राशि पर, पूरी अवधि के लिए गिना जाता है — चाहे आपने आधा मूलधन चुका दिया हो। इसमें दर संख्या के रूप में छोटी दिखती है पर असल लागत काफ़ी ऊँची होती है।

दोनों की तुलना करने का एक ही सही तरीक़ा है: वार्षिक प्रतिशत दर पूछिए, जो सभी शुल्कों को मिलाकर वास्तविक वार्षिक लागत बताती है। दो प्रस्तावों की तुलना केवल इसी संख्या पर की जा सकती है।

यही कारण है कि "केवल इतने प्रतिशत" वाले विज्ञापन को अकेले देखकर फ़ैसला नहीं करना चाहिए। सवाल यह नहीं है कि दर क्या है, सवाल यह है कि दर किस पर लग रही है।

और हमेशा कुल चुकाई जाने वाली राशि पूछिए — किश्त गुणा महीनों की संख्या। वह एक संख्या पूरे प्रस्ताव को सबसे ईमानदारी से बता देती है।

वे शुल्क जो दर में नहीं दिखते

ऋण की असली लागत केवल ब्याज नहीं है। कई शुल्क ऐसे हैं जो दर में शामिल नहीं दिखते पर जेब से जाते हैं, और उन्हें पहले से पूछना पड़ता है क्योंकि वे स्वयं नहीं बताए जाते।

प्रसंस्करण शुल्क सबसे आम है और वह आमतौर पर वितरण के समय ही काट लिया जाता है। यानी जितना ऋण स्वीकृत हुआ, हाथ में उससे कम आता है, जबकि ब्याज पूरी स्वीकृत राशि पर लगता है।

दूसरा है समय से पहले भुगतान पर लगने वाला शुल्क। यह सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भविष्य में आपके विकल्प तय करता है। ऋण लेने से पहले यह ज़रूर पूछिए कि आंशिक और पूर्ण, दोनों तरह के पूर्व-भुगतान पर क्या नियम लागू होंगे।

तीसरा है देर से भुगतान पर शुल्क और उस पर लगने वाला अतिरिक्त ब्याज, जो सामान्य दर से ऊँचा होता है।

चौथा, कभी-कभी ऋण के साथ एक बीमा पॉलिसी भी जोड़ दी जाती है। वह उपयोगी हो सकती है, पर वह एक अलग उत्पाद है और उसका प्रीमियम ऋण की लागत में जुड़ता है। यह वैकल्पिक है या अनिवार्य, यह पूछना आपका अधिकार है।

सारे शुल्क स्वीकृति पत्र में लिखे होते हैं। हस्ताक्षर से पहले उस पत्र को पूरा पढ़ने का समय माँगना पूरी तरह उचित है, और कोई भी अच्छा ऋणदाता उससे मना नहीं करेगा।

पूर्व-भुगतान का गणित

ऋण की लागत घटाने का सबसे प्रभावी तरीक़ा पूर्व-भुगतान है, और उसमें समय का महत्व राशि से भी ज़्यादा होता है।

शुरुआती वर्षों में किया गया पूर्व-भुगतान सबसे ज़्यादा ब्याज बचाता है, क्योंकि उस समय शेष मूलधन सबसे बड़ा होता है और उसी पर ब्याज लग रहा होता है।

पूर्व-भुगतान करते समय एक विकल्प चुनना होता है: किश्त वही रखकर अवधि घटा दी जाए, या अवधि वही रखकर किश्त घटा दी जाए। पहला विकल्प कहीं ज़्यादा ब्याज बचाता है।

दूसरा विकल्प तब उपयुक्त है जब मासिक नक़दी का दबाव हो। यह चुनाव आपका है और ऋणदाता से स्पष्ट रूप से कहना पड़ता है, क्योंकि डिफ़ॉल्ट व्यवस्था हर जगह एक जैसी नहीं होती।

हर पूर्व-भुगतान के बाद नई परिशोधन तालिका माँगिए और यह पुष्टि कीजिए कि राशि मूलधन में समायोजित हुई है, ब्याज में नहीं। यह जाँच एक मिनट की है और बहुत ज़रूरी है।

और ऋण पूरा चुक जाने के बाद अनापत्ति प्रमाणपत्र ज़रूर लीजिए, और कुछ महीनों बाद अपनी क्रेडिट रिपोर्ट में देख लीजिए कि खाता बंद दिखाया गया है। बंद न दिखाया गया ऋण भविष्य में उधार लेने में बाधा बनता है।

उधार लेने से पहले के चार सवाल

व्यक्तिगत ऋण अपने-आप में बुरा नहीं है। वह एक औज़ार है, और उसकी उपयुक्तता चार सवालों के जवाब से तय होती है।

पहला: यह ख़र्च टाला जा सकता है या नहीं? अगर टाला जा सकता है, तो अक्सर बचत करके बाद में करना सस्ता पड़ता है। अगर नहीं टाला जा सकता — इलाज, कोई ज़रूरी मरम्मत — तो ऋण उचित है।

दूसरा: क्या इससे सस्ता कोई विकल्प मौजूद है? किसी परिसंपत्ति पर लिया गया ऋण आमतौर पर व्यक्तिगत ऋण से सस्ता होता है, और कार्ड की बकाया राशि को किश्तों में बदलना भी अक्सर सस्ता पड़ता है।

तीसरा: क्या किश्त मेरी मासिक आय में आराम से बैठती है? एक सामान्य मार्गदर्शन यह है कि सभी ऋणों की कुल किश्तें आय के एक तिहाई से अधिक न हों, और यह सीमा आपके अपने ख़र्चों के हिसाब से और कम भी हो सकती है।

चौथा: अगर तीन महीने आय रुक जाए तो क्या होगा? इसका जवाब आपातकालीन कोष है। बिना उसके लिया गया ऋण पहली रुकावट पर ही चूक में बदल जाता है।

इन चार सवालों के जवाब लिखकर देखिए, सोचकर नहीं। लिखा हुआ जवाब उस दबाव में भी टिकता है जो ऋण स्वीकृत हो जाने के उत्साह में पैदा होता है।