हर बड़ी गिरावट के आँकड़ों में एक ही पैटर्न दोहराता है: बाज़ार जितना गिरता है, उतनी ही SIP बंद होती हैं। भावना समझ में आती है — हर महीने पैसा डालो और अगले महीने उसकी क़ीमत कम दिखे, तो लगता है नल बंद कर देना ही समझदारी है। पर SIP का पूरा तर्क ही इसी घड़ी के लिए बना है, और नल बंद करना उस तर्क को ठीक उलटी जगह काटता है।
यह लेख कोई भविष्यवाणी नहीं करता — बाज़ार कब गिरेगा, कब उठेगा, कोई नहीं जानता। यह सिर्फ़ वह गणित दिखाता है जो गिरावट के महीनों में चुपचाप काम करता है, और जिसे रोकने की क़ीमत निवेशक बरसों बाद चुकाता है।
गिरावट में SIP सस्ता ख़रीदती है
SIP की एक किस्त हर महीने उतने ही रुपये की यूनिट ख़रीदती है — दाम ऊँचा हो तो कम यूनिट, दाम गिरा हो तो ज़्यादा। यानी गिरावट के महीने वे इकलौते महीने हैं जब वही किस्त ज़्यादा यूनिट घर लाती है। इसे ही "रुपी कॉस्ट एवरेजिंग" कहते हैं: आपकी औसत ख़रीद-क़ीमत अपने-आप घटती है, बिना किसी भविष्यवाणी के।
अब उलटा सोचिए: जो निवेशक गिरावट में SIP रोकता है, वह सिर्फ़ महँगे महीनों में ख़रीदता है और सस्ते महीनों में बाहर बैठता है। और जो गिरावट के बाद "माहौल ठीक होने" का इंतज़ार करता है, वह अक्सर उछाल के शुरुआती, सबसे तेज़ दिन चूक जाता है — बाज़ार के इतिहास में रिकवरी के सबसे बड़े दिन प्रायः सबसे बुरे दिनों के आसपास ही छिपे होते हैं।
डर के महीनों के लिए तीन इंतज़ाम
पहला: SIP सिर्फ़ उसी पैसे से कीजिए जिसकी ज़रूरत कम-से-कम पाँच-सात साल नहीं है, और इमरजेंसी फंड अलग रखिए — तब गिरावट में बेचने की मजबूरी ही नहीं बनती। दूसरा: पोर्टफोलियो देखने की आदत तय कीजिए — रोज़ नहीं, हफ़्ते में नहीं; तिमाही में एक बार काफ़ी है। लाल आँकड़े रोज़ देखने से निर्णय भावना करने लगती है, गणित नहीं।
तीसरा: गिरावट से पहले ही अपने-आप से लिखित वादा कीजिए — "बाज़ार जितना भी गिरे, मेरी SIP चलती रहेगी; रोकने का फ़ैसला मैं गिरावट के महीने में कभी नहीं लूँगा।" शांति के समय लिया गया निर्णय तूफ़ान के समय लिए गए निर्णय से लगभग हमेशा बेहतर होता है। म्यूचुअल फंड बाज़ार-जोखिम के अधीन हैं — पर उस जोखिम की सबसे बड़ी क़ीमत प्रायः वही चुकाता है, जो बीच रास्ते में उतर जाता है।