हर किसी के पास एकमुश्त बड़ी रक़म नहीं होती, पर हर महीने थोड़ा-थोड़ा बचाना संभव है। रिकरिंग डिपॉज़िट (RD) इसी के लिए बना है — इसमें आप हर महीने एक तय रक़म बैंक में जमा करते हैं और अवधि के अंत में ब्याज के साथ एकमुश्त पाते हैं।
यह अनुशासित बचत की एक सरल और सुरक्षित आदत है।
RD के फ़ायदे
RD सुरक्षित है और इसका रिटर्न पहले से तय होता है, इसलिए बाज़ार के उतार-चढ़ाव की चिंता नहीं। यह छोटी रक़म से भी शुरू हो सकता है, जिससे नए बचतकर्ता के लिए यह आसान है।
यह उन नज़दीकी लक्ष्यों के लिए अच्छा है जिनके लिए पैसा कुछ महीनों या वर्ष-दो-वर्ष में चाहिए।
सीमाएँ
सुरक्षा की क़ीमत यह है कि RD का रिटर्न आमतौर पर इक्विटी जैसे विकल्पों से कम होता है, और लंबी अवधि में महँगाई को हराने के लिए यह अकेला काफ़ी नहीं। इसलिए इसे लंबी अवधि की संपत्ति-निर्माण का मुख्य साधन न बनाएँ।
ब्याज पर कर के नियम भी लागू होते हैं।
सही जगह पर उपयोग
RD का सही उपयोग है — अनुशासित, सुरक्षित, छोटी बचत की आदत डालना और नज़दीकी लक्ष्य के लिए पैसा जमा करना। लंबी अवधि के लिए इसे इक्विटी जैसे विकास वाले विकल्पों के साथ संतुलित करें।
यह लेख सामान्य जानकारी है।
RD और FD में असली फ़र्क़
दोनों बैंक में जमा हैं, दोनों की ब्याज दर पहले से तय होती है, और दोनों में बाज़ार का उतार-चढ़ाव नहीं आता। इसलिए बहुत से लोग मान लेते हैं कि दोनों एक ही चीज़ हैं। फ़र्क़ पैसे में नहीं, समय में है।
FD में पूरी राशि पहले दिन जमा होती है और पूरी अवधि तक ब्याज कमाती है। RD में राशि हर महीने थोड़ी-थोड़ी जाती है, इसलिए पहली किश्त पूरी अवधि तक ब्याज कमाती है, दूसरी उससे एक महीना कम, और आख़िरी किश्त सिर्फ़ एक महीना।
इसका सीधा नतीजा यह है कि एक ही दर पर, एक ही कुल राशि पर, RD का ब्याज FD के ब्याज से कम बैठता है। यह बैंक की चालाकी नहीं है, यह गणित है। जिसने यह समझ लिया, वह RD के नतीजे देखकर निराश नहीं होता।
तो फिर RD क्यों? क्योंकि FD के लिए आपके पास पहले दिन पूरी राशि होनी चाहिए। अगर वह होती, तो सवाल ही नहीं उठता। RD उनके लिए है जिनके पास एकमुश्त राशि नहीं है लेकिन हर महीने एक निश्चित रक़म बचाने की क्षमता है।
व्यावहारिक तरीक़ा यह है कि दोनों को साथ चलाया जाए। RD से राशि इकट्ठी कीजिए, और परिपक्व होने पर उसे FD में डाल दीजिए। RD आदत बनाता है, FD उस आदत के नतीजे को सँभालता है।
समय से पहले तोड़ने पर क्या होता है
RD खोलते समय यह सवाल कोई नहीं पूछता, और बाद में यही सबसे ज़्यादा पूछा जाता है। ज़्यादातर बैंकों में RD समय से पहले बंद की जा सकती है, लेकिन उस पर एक जुर्माना लगता है।
जुर्माना आमतौर पर ब्याज दर में कटौती के रूप में आता है। यानी आपको वह दर नहीं मिलती जो खाता खोलते समय तय हुई थी, बल्कि उस अवधि के लिए लागू दर में से आधा या एक प्रतिशत घटाकर दिया जाता है। मूलधन आमतौर पर सुरक्षित रहता है।
दूसरी बात जो कम लोग जानते हैं: किश्त चूकने पर भी छोटा शुल्क लग सकता है। लगातार कई किश्तें चूक जाएँ तो कुछ बैंक खाता ही बंद कर देते हैं और जमा राशि बचत खाते में लौटा देते हैं।
इसलिए किश्त की राशि तय करते समय उदार होने के बजाय सावधान रहना बेहतर है। जो व्यक्ति पाँच हज़ार की RD चलाकर बीच में तोड़ देता है, उससे बेहतर वह है जो तीन हज़ार की RD पूरी अवधि चलाता है।
और अगर बीच में तोड़ना ही पड़े, तो यह विफलता नहीं है। RD का काम पैसा जमा करना था, और वह जमा हुआ। जुर्माना उस सुविधा की क़ीमत है, और वह क़ीमत क़र्ज़ लेने से लगभग हमेशा कम पड़ती है।
टैक्स का हिस्सा, जिसे लोग भूल जाते हैं
RD पर मिलने वाला ब्याज कर-मुक्त नहीं है। वह आपकी कुल आय में जुड़ता है और आपके स्लैब के हिसाब से कर लगता है। यह बात बहुत से लोगों को परिपक्वता के बाद पता चलती है, जो सबसे ग़लत समय है।
इसके अलावा, अगर एक वित्तीय वर्ष में एक ही बैंक से मिलने वाला ब्याज एक तय सीमा से ऊपर चला जाए तो बैंक स्रोत पर कर काट लेता है। कटा हुआ कर आपके फ़ॉर्म 26AS में दिखता है और रिटर्न भरते समय समायोजित हो जाता है।
यहाँ एक आम ग़लतफ़हमी है: लोग सोचते हैं कि अगर बैंक ने कर काट लिया तो मामला ख़त्म। ऐसा नहीं है। बैंक एक निश्चित दर पर काटता है; अगर आपका स्लैब उससे ऊँचा है तो बाक़ी कर आपको ख़ुद भरना होगा।
दूसरी तरफ़, अगर आपकी कुल आय कर योग्य सीमा से नीचे है, तो साल की शुरुआत में उपयुक्त घोषणा-पत्र जमा करके कटौती रुकवाई जा सकती है। यह काम अप्रैल में करना होता है, मार्च में नहीं।
सबसे व्यावहारिक आदत यह है कि ब्याज को साल-दर-साल आय मानकर चलिए, चाहे वह हाथ में आया हो या नहीं। इससे परिपक्वता के साल में अचानक बड़ा कर-बोझ नहीं पड़ता।
RD किसके लिए सबसे उपयुक्त है
RD का सबसे अच्छा उपयोग एक से तीन साल के भीतर आने वाले निश्चित ख़र्च के लिए है — फ़ीस, बीमा का सालाना प्रीमियम, कोई नियोजित यात्रा, या घर का कोई काम जिसकी तारीख़ पहले से पता है।
यह उस व्यक्ति के लिए भी उपयुक्त है जो पहली बार बचत शुरू कर रहा है। बाज़ार से जुड़े विकल्प में शुरुआती गिरावट देखकर बहुत से नए बचतकर्ता हमेशा के लिए डर जाते हैं। RD में वह डर नहीं आता, और आदत बन जाती है।
यह उनके लिए भी अच्छा है जिनकी आय निश्चित है लेकिन अनुशासन कमज़ोर है। किश्त खाते से अपने-आप कट जाती है, और चूकने पर शुल्क लगता है — यह हल्का दबाव कई लोगों के लिए ठीक उतना ही होता है जितना चाहिए।
यह किसके लिए उपयुक्त नहीं है? दस-पंद्रह साल के लक्ष्य के लिए। इतनी लंबी अवधि में महँगाई ब्याज को खा जाती है, और उस काम के लिए बाज़ार से जुड़े विकल्प ऐतिहासिक रूप से बेहतर रहे हैं, हालाँकि उनमें उतार-चढ़ाव सहना पड़ता है।
और यह आपातकालीन कोष का विकल्प भी नहीं है। आपात राशि ऐसी जगह होनी चाहिए जहाँ से वह उसी दिन निकल सके, बिना जुर्माने के।
RD चलाते समय होने वाली आम ग़लतियाँ
पहली ग़लती: किश्त इतनी बड़ी रखना कि वह महीने के आख़िरी हफ़्ते में तकलीफ़ दे। बचत जो तकलीफ़ देती है, वह टिकती नहीं। जो राशि आराम से चल जाए, वही असली राशि है।
दूसरी: किश्त की तारीख़ वेतन आने से बहुत बाद रखना। महीने की पच्चीस तारीख़ को कटने वाली किश्त हर महीने एक छोटी लड़ाई बन जाती है। वेतन आने के अगले दिन कटने वाली किश्त कभी लड़ाई नहीं बनती।
तीसरी: परिपक्वता के बाद राशि को बचत खाते में छोड़ देना। यह सबसे महँगी ग़लती है, क्योंकि जिस अनुशासन से पैसा जमा हुआ, वह बिना योजना के कुछ ही हफ़्तों में ख़र्च हो जाता है।
चौथी: एक ही समय पर तीन-चार RD चलाना। यह अनुशासित लगता है, पर असल में हर एक की किश्त छोटी होती है और मिलाकर वही बोझ बनता है, बस हिसाब रखना मुश्किल हो जाता है। एक RD, सही राशि पर, बेहतर है।
पाँचवीं: दर की तुलना किए बिना खाता खोल लेना। अलग-अलग बैंकों और डाकघर की दरें अलग होती हैं, और छोटे अंतर भी लंबी अवधि में दिखते हैं। दस मिनट की तुलना पूरे साल काम आती है।