शादी के गहनों से लेकर धनतेरस के सिक्के तक, सोना भारतीय घरों में सदियों से बचत का पर्याय रहा है। भावना अपनी जगह है, पर निवेश की मेज़ पर बैठें तो सवाल बदल जाता है: यदि मक़सद संपत्ति बढ़ाना है, तो सोना किस रूप में ख़रीदना चाहिए — और कितना?
आधुनिक निवेशक के पास चार मुख्य रास्ते हैं: भौतिक सोना (गहने/सिक्के), गोल्ड ETF, गोल्ड म्यूचुअल फंड, और (जब सरकार जारी करे) सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड। चारों की लागत, सुरक्षा, तरलता और टैक्स-व्यवहार अलग-अलग हैं — और यही अंतर लंबी अवधि में लाखों का फ़र्क़ पैदा करता है।
भौतिक सोना: भावना महँगी पड़ती है
गहनों की पहली सच्चाई मेकिंग चार्ज है — 8% से 25% तक, जो बेचते समय लगभग कभी वापस नहीं मिलता; साथ में 3% GST अलग। यानी ख़रीदते ही निवेश दो अंकों के घाटे से शुरू होता है। ऊपर से लॉकर का किराया, चोरी का जोखिम और शुद्धता की चिंता (हॉलमार्क अनिवार्य रूप से देखें — अब छह अंकों का HUID आधार है)।
इसका मतलब यह नहीं कि गहने मत ख़रीदिए — पहनने की चीज़ का अपना आनंद है। मतलब सिर्फ़ इतना है कि गहनों को “निवेश” के खाते में मत लिखिए। निवेश वाला सोना काग़ज़ी/डिजिटल रूप में सस्ता, सुरक्षित और शुद्ध मिलता है।
ETF, गोल्ड फंड और SGB
गोल्ड ETF शेयर की तरह एक्सचेंज पर ख़रीदा-बेचा जाता है, हर यूनिट के पीछे शुद्ध सोना, न मेकिंग चार्ज न शुद्धता की चिंता; चाहिए बस डीमैट खाता। गोल्ड म्यूचुअल फंड वही काम बिना डीमैट के SIP-सुविधा के साथ करते हैं, थोड़ी अतिरिक्त लागत पर। छोटे-छोटे मासिक निवेश के लिए यह सबसे व्यावहारिक रास्ता है।
सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGB) — जब उपलब्ध हों — निवेश-सोने का सबसे समृद्ध रूप रहे हैं: सोने के भाव के साथ-साथ सालाना ब्याज, और परिपक्वता तक रखने पर पूँजीगत लाभ की छूट। सीमा यह कि इनकी उपलब्धता सरकारी निर्गम पर निर्भर है और बीच में बेचना ETF जितना आसान नहीं। जो निर्गम खुले, उसकी शर्तें उसी समय पढ़कर तय करें।
पोर्टफोलियो में कितना सोना?
सोना आमदनी नहीं देता — न ब्याज, न लाभांश (SGB के ब्याज को छोड़कर); इसका काम पोर्टफोलियो का “बीमा” होना है, इंजन नहीं। संकट और मुद्रास्फीति के दौर में यह चमकता है, इसलिए ज़्यादातर सलाहकार कुल निवेश का 5–10% सोने में रखने की बात करते हैं — इतना कि गिरते बाज़ार में सहारा दे, इतना नहीं कि बढ़ते बाज़ार की कमाई खा जाए।
सार यह: पहनने के लिए गहना, निवेश के लिए ETF/गोल्ड फंड (और SGB जब मिलें), मात्रा सीमित, और ख़रीद नियमित। पीली धातु को पोर्टफोलियो का मसाला रहने दीजिए — पूरी थाली मत बनाइए।