बजट के नाम से ज़्यादातर लोगों को हिसाब की डायरी और कटौती की तपस्या याद आती है — इसीलिए ज़्यादातर बजट दूसरे महीने दम तोड़ देते हैं। 50-30-20 नियम इस समस्या का सबसे टिकाऊ इलाज है, क्योंकि यह ख़र्च गिनने से नहीं, बाँटने से शुरू होता है: कर-पश्चात आमदनी के तीन डिब्बे — 50% ज़रूरतें, 30% इच्छाएँ, 20% बचत-निवेश।

ज़रूरतों में वह सब है जिनके बिना जीवन नहीं चलता: किराया/EMI, राशन, बिजली-गैस, स्कूल फीस, बीमा प्रीमियम, आने-जाने का ख़र्च। इच्छाओं में वह सब जो जीवन को रंग देता है: बाहर खाना, OTT, यात्रा, नया फ़ोन। और 20% वाला डिब्बा आपके भविष्य का वेतन है — इमरजेंसी फंड, SIP, PPF, NPS।

भारतीय हालात में ढालना

महानगर के किराए और EMI अक्सर 50% के डिब्बे को छलका देते हैं — तब ईमानदार समायोजन कीजिए: कुछ समय 60-25-15 चलाइए, पर बचत का डिब्बा कभी शून्य न हो। उल्टी स्थिति भी उतनी ही सच है: घर का अपना हो और ज़रूरतें 35% में निपटती हों, तो बचत को 20 पर रोकना आलस है — 30-35% तक ले जाइए; भारत में जल्दी रिटायरमेंट का यही एकमात्र वैध शॉर्टकट है।

संयुक्त परिवार, माता-पिता को भेजा जाने वाला पैसा और त्योहार-शादियों के मौसमी ख़र्च — इन्हें “इच्छा” कहना ग़लत होगा; इन्हें ज़रूरतों में गिनकर प्रतिशत ठीक कीजिए। नियम की ख़ूबी उसकी पवित्रता नहीं, उसका ढाँचा है: तीन डिब्बे साफ़ हों तो घर की आर्थिक बहस “तूने कितना उड़ाया” से हटकर “डिब्बों का अनुपात क्या हो” पर आ जाती है — और यह कहीं स्वस्थ बहस है।

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चलाने की तरकीब: तनख़्वाह के दिन तीन रास्ते

नियम को इच्छाशक्ति पर मत छोड़िए — ऑटोमेशन पर छोड़िए। वेतन आने के अगले दिन के लिए तीन स्थायी निर्देश लगाइए: 20% सीधे SIP/RD/PPF की ओर, ज़रूरतों का हिस्सा उसी खाते में जहाँ से बिल कटते हैं, और इच्छाओं का हिस्सा अलग खाते या UPI-वॉलेट में। महीने के आख़िर में इच्छा-खाता ख़ाली हो जाए तो रुक जाइए — यही पूरा अनुशासन है।

हर छह महीने में दस मिनट की समीक्षा कीजिए: इंक्रीमेंट आया हो तो उसका आधा सीधे 20% वाले डिब्बे में बढ़ाइए — जीवन-स्तर धीरे बढ़ेगा, संपत्ति तेज़। बजट का मक़सद ख़र्च का हिसाब रखना नहीं, ख़र्च की चिंता से आज़ादी है — तीन डिब्बे सही भरे हों, तो इच्छा-डिब्बे का हर रुपया बिना अपराध-बोध के ख़र्च करने के लिए ही है।

जब अनुपात आपकी स्थिति में बैठता ही नहीं

यह नियम एक औसत के लिए बना है, और भारत में बहुत सी स्थितियाँ उस औसत से दूर हैं। जब संख्याएँ न बैठें, तो नियम छोड़ देना ग़लत निष्कर्ष है — उसे समायोजित करना सही है।

सबसे आम स्थिति महँगे शहरों की है, जहाँ अकेले किराया ही आय का चालीस प्रतिशत ले लेता है। यहाँ पचास प्रतिशत में सभी ज़रूरतें रखना असंभव है।

ऐसी स्थिति में सही तरीक़ा यह है कि बचत का हिस्सा पहले तय कीजिए — भले वह बीस प्रतिशत न होकर दस हो — और शेष को ज़रूरतों तथा इच्छाओं में बाँटिए। बचत का प्रतिशत घट सकता है; बचत का शून्य होना नहीं चाहिए।

दूसरी आम स्थिति कम आय की है, जहाँ ज़रूरतें अपने आप सत्तर या अस्सी प्रतिशत ले लेती हैं। यहाँ नियम का उद्देश्य अनुपात नहीं बल्कि दिशा है: कोई भी राशि, नियमित रूप से, ज़रूरतों के हिस्से से बाहर।

और तीसरी स्थिति उल्टी है — ऊँची आय, जहाँ ज़रूरतें तीस प्रतिशत में पूरी हो जाती हैं। यहाँ बीस प्रतिशत बचाना बहुत कम है, और अनुपात को ऊपर की ओर समायोजित करना चाहिए।

जो ख़र्च बीच में आते हैं उन्हें कैसे बाँटें

नियम लागू करते समय सबसे अधिक समय इसी पर जाता है: यह ख़र्च ज़रूरत है या इच्छा? और यही वह जगह है जहाँ लोग सबसे अधिक बहस करते हैं — अपने आप से।

एक उपयोगी परीक्षण यह है: यदि यह ख़र्च रुक जाए तो क्या आपकी आय, स्वास्थ्य या सुरक्षा पर सीधा असर पड़ेगा? यदि हाँ, तो यह ज़रूरत है। यदि केवल असुविधा होगी, तो यह इच्छा है।

इस परीक्षण से कुछ स्पष्ट उत्तर मिलते हैं। काम पर जाने का ख़र्च ज़रूरत है; उसी रास्ते पर अधिक आरामदायक विकल्प चुनना इच्छा है। फ़ोन का बुनियादी रिचार्ज ज़रूरत है; उससे ऊपर का पैकेज इच्छा है।

एक और उपयोगी तरीक़ा यह है कि एक ही श्रेणी को दो हिस्सों में बाँट दिया जाए। भोजन का राशन ज़रूरत के डिब्बे में जाता है और बाहर खाना इच्छा के डिब्बे में — दोनों "खाना" हैं पर वे एक चीज़ नहीं हैं।

और सबसे महत्वपूर्ण: इस वर्गीकरण को ईमानदार रखिए, पर उस पर बहुत समय मत लगाइए। एक मोटा और ईमानदार बँटवारा उस सटीक बँटवारे से कहीं अधिक उपयोगी है जो कभी पूरा नहीं होता।

साल में एक-दो बार आने वाले ख़र्च

यह वह जगह है जहाँ अधिकांश मासिक बजट टूटते हैं, और वे इसलिए टूटते हैं क्योंकि बजट मासिक है जबकि ये ख़र्च नहीं हैं।

बीमा का प्रीमियम, स्कूल की फ़ीस, त्योहार, कोई वार्षिक सदस्यता, वाहन का बीमा और सर्विस, कोई शादी या यात्रा — ये सब निश्चित हैं और फिर भी मासिक बजट में कहीं नहीं दिखते।

इसका समाधान सरल है और उसे सिंकिंग फंड कहते हैं। इन सभी वार्षिक ख़र्चों को जोड़िए, बारह से भाग दीजिए, और उतनी राशि हर महीने अलग रख दीजिए — ठीक वैसे ही जैसे कोई और मासिक बिल।

इससे दो चीज़ें होती हैं। पहली, जिस महीने वह ख़र्च आता है, वह महीना संकट नहीं बनता। दूसरी, और अधिक महत्वपूर्ण, आपकी बचत उन महीनों में नहीं टूटती, क्योंकि पैसा पहले से अलग रखा हुआ है।

यह एक छोटा-सा जोड़ है जो पूरे बजट को स्थिर कर देता है, और यही वह हिस्सा है जो अधिकांश सरल नियमों में नहीं बताया जाता।

अनियमित आय वाले लोगों के लिए

यह नियम मासिक वेतन को मानकर बना है, और भारत में बहुत बड़ी संख्या में लोगों की आय ऐसी नहीं है — दुकानदार, किसान, फ्रीलांसर, कमीशन पर काम करने वाले।

ऐसी स्थिति में पहला क़दम प्रतिशत नहीं, एक आधार-रेखा तय करना है। पिछले बारह महीनों में जो सबसे कम आय वाला महीना रहा, उसे अपना "वेतन" मानिए और उसी पर बजट बनाइए।

जिन महीनों में आय उससे अधिक हो, वह अतिरिक्त राशि सीधे दो जगह जाए: पहले आपातकालीन कोष तक, और उसके बाद निवेश तक। उसे मासिक ख़र्च में मत मिलाइए, क्योंकि तब वह आधार-रेखा को ऊपर खींच देगी।

यह तरीक़ा शुरू में कठिन लगता है क्योंकि अच्छे महीनों में भी संयम रखना पड़ता है। पर यही वह अनुशासन है जो बुरे महीनों को सामान्य बना देता है, और अनियमित आय में यही सबसे बड़ी राहत है।

और एक अतिरिक्त सुझाव: अनियमित आय वाले लोगों के लिए आपातकालीन कोष का आकार बड़ा होना चाहिए — नौ से बारह महीने — क्योंकि यहाँ आय का रुकना असामान्य घटना नहीं, व्यवसाय का सामान्य हिस्सा है।

बिना ऐप के हिसाब रखना

बहुत से लोग बजट इसलिए छोड़ देते हैं कि हर ख़र्च दर्ज करना थका देता है, और यह आपत्ति उचित है। पर हिसाब रखने का यह एकमात्र तरीक़ा नहीं है।

सबसे सरल विकल्प खातों को अलग करना है। एक खाता जिससे बिल और ज़रूरतें जाती हैं, एक जिसमें इच्छाओं का हिस्सा रहता है, और एक जहाँ बचत जाती है। फिर हर ख़र्च दर्ज करने की ज़रूरत नहीं — शेष राशि अपने आप बता देती है।

दूसरा विकल्प महीने में एक बार का पुनरावलोकन है। हर लेन-देन के समय कुछ मत कीजिए; महीने के अंत में एक बार विवरण देखिए और तीन डिब्बों में जोड़ लीजिए। इसमें बीस मिनट लगते हैं।

तीसरा विकल्प और भी सरल है और उन लोगों के लिए अच्छा है जो नक़द अधिक इस्तेमाल करते हैं: इच्छाओं का पूरा हिस्सा महीने की शुरुआत में नक़द निकाल लीजिए। जब लिफ़ाफ़ा ख़ाली हो जाए, महीना समाप्त।

इनमें से कोई भी तरीक़ा "सही" नहीं है। सही वही है जिसे आप छह महीने तक निभा सकें, और यह जान लेना कि ऐप ही एकमात्र रास्ता नहीं है, बहुत लोगों को दोबारा शुरू करने का मौक़ा दे देता है।

बजट कब बदलना चाहिए

एक बार बना बजट हमेशा के लिए नहीं होता, और उसे न बदलना उतनी ही आम ग़लती है जितना उसे बहुत बार बदलना।

चार घटनाएँ ऐसी हैं जिनके बाद बजट दोबारा बनाना चाहिए: आय में बड़ा बदलाव, घर या शहर बदलना, परिवार में कोई नया सदस्य या नया आश्रित, और कोई बड़ा दायित्व शुरू या समाप्त होना।

इनके अलावा वर्ष में एक बार सामान्य समीक्षा पर्याप्त है। हर महीने अनुपात बदलते रहना बजट को व्यवस्था के बजाय एक और चिंता बना देता है।

समीक्षा में देखने लायक़ एक ही मुख्य संख्या है: बचत का प्रतिशत पिछले वर्ष से ऊपर है या नीचे। यदि ऊपर है, तो बाक़ी विवरण पर बहस करने की ज़रूरत नहीं।

और यदि नीचे है, तो कारण खोजने के लिए स्थायी दायित्वों की सूची से शुरू कीजिए, दैनिक ख़र्चों से नहीं। लगभग हर बार असली कारण वहीं मिलता है।